नई दिल्ली: कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की शिक्षा नीति पर तीखी आलोचना करते हुए इसे भारतीय शिक्षा के लिए खतरे के रूप में बताया और कहा कि इस स्थिति का समाधान शीघ्र होना चाहिए। सोनिया गांधी ने एक लेख में कहा कि उच्च शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के लागू होने के बावजूद यह सरकार भारत के बच्चों और युवाओं की शिक्षा के प्रति उदासीन रही है। उन्होंने तीन सी (केंद्रीकरण, व्यवसायीकरण, सांप्रदायिकरण) का जिक्र करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में केवल तीन मुख्य एजेंडों को बढ़ावा दिया है-सत्ता का केंद्रीकरण, शिक्षा का व्यवसायीकरण, और पाठ्यपुस्तकों तथा संस्थानों का सांप्रदायिकरण। उन्होंने कहा कि पिछले दशक में सरकार की पहचान ‘अनियंत्रित केंद्रीकरण’ के रूप में रही है। शिक्षा के क्षेत्र में इसका सबसे हानिकारक प्रभाव देखने को मिला है। उदाहरण के तौर पर, केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (सीएबीई) की बैठक सितंबर 2019 से नहीं बुलाई गई। इसके साथ ही, एनईपी 2020 को लागू करते समय भी राज्य सरकारों से एक बार भी परामर्श नहीं किया गया। इसके अलावा सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार पर शिक्षा के व्यवसायीकरण का आरोप लगाते हुए कहा कि गरीबों को सार्वजनिक शिक्षा से बाहर किया जा रहा है और उन्हें महंगे निजी स्कूलों में धकेला जा रहा है।
सरकार ने उच्च शिक्षा में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ‘ब्लॉक-अनुदान’ प्रणाली के स्थान पर उच्च शिक्षा वित्तपोषण एजेंसी (एचईएफए) की शुरुआत की है, जिससे शिक्षा में निजी निवेश बढ़ रहा है। सोनिया ने सरकार पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास के कुछ महत्त्वपूर्ण हिस्सों को पाठ्यपुस्तकों से हटाने की कोशिश की गई, जैसे महात्मा गांधी की हत्या और मुगल भारत से संबंधित अनुभाग। इसके साथ ही भारतीय संविधान की प्रस्तावना को भी कुछ समय के लिए पाठ्यपुस्तकों से हटा दिया गया था, जिसे बाद में सार्वजनिक विरोध के बाद पुन: शामिल किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान आईआईटी और भारतीय प्रबंधन संस्थान आईआईएम जैसे प्रमुख संस्थानों में सरकार के अनुकूल विचारधारा वाले लोगों को नेतृत्व पदों पर नियुक्त किया जा रहा है, भले ही उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता संदेहास्पद हो।